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राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (एन.एम.एच.एस)

क्रियांन्वयन- पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार
नोडल एवं सेवा केन्द्र- गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान


वृहद विषयगत क्षेत्र: 5 आधारभूत विकास



भारत हिमालयी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास का महत्व

हिमालयी क्षेत्र में, आधुनिक समाज के विकास का आधार अनेक संरचनाएं जैसे - बांध, जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क और होटल, सुरंगों आदि का अब तक अवैज्ञानिक ढंग से निर्माण किया गया है। चूंकि बढ़ती मानव आबादी से जुड़े विकास की यह आवश्यकता है, जो क्षेत्र में सहायक उद्योगों, संचार मार्गों, परिवहन, पर्यटन और अन्य विकास कार्यों के विकास का भी नेतृत्व करता है, लेकिन यह पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव भी डाल सकता है। जिस कारण इस क्षेत्र में जनवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव जैसे बादलों का फटना, बाढ़ आदि की आवृति भी बढ़ गई है। इस संदर्भ में, एक वैकल्पिक मॉडल को अपनाने की आवश्यकता है जो स्थानीय समुदायों की आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, स्वदेशी ज्ञान और जैविक कृषि के तरीकों को प्रोत्साहित करेगी, पर्यावरण-पर्यटन, वनीकरण आदि का समर्थन करेगी। इस दिशा में, राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत 11 परियोजनाएं चल रही हैं, जिसका लक्ष्य पर्वतीय़ क्षेत्र में वैकल्पिक क्षेत्र / प्रदर्शन मॉडल / तकनीकों को सीधे संबोधित करना है।


IHR States Covered-IHR आच्छादित भारतीय हिमालयी राज्य : 09 (जम्मू एवं कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, अरुणांचल प्रदेश, असम, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा एवं मेघालय)

प्रमुख उद्देश्य

लद्दाख क्षेत्र हेतु नवीकरण ऊर्जा परियोजनाओं के प्रभावों का अध्ययन एवं उनके प्रभावों स्वीकारिता एवं न्यूनीकरण को समझना।
लद्दाख क्षेत्र में मानवीय पारिस्थितिकीय प्रक्रिया को विकसित करने हेतु प्रभावशाली पर्यावरणीय प्रबंधन एवं चिंतनीय रणनीति को विकसित करना।
कम लागत वाले टिकाऊ बांस टुकड़ों एवं/भागों से निर्मित प्रारूप मकानों का निर्माण करना।
सामाजिक उपयोग हेतु भू-स्खलन पूर्व चेतावनी तंत्र की स्थापना करना।
स्वदेशी ज्ञान प्रणाली को समर्पित डिजिटल डाटाबेस की तैयारी करना।
जैव उत्पादों के उत्पादन और कृषिकरण हेतु सतत् एवं वैज्ञानिक रणनीति का विकास करना।
मूल्य सवंर्धित उत्पादों का विकास करना।
लो-रेंज तकनीक पर आधारित संचार तंत्र का विकास
वेब /एप आधारित ग्राफिकल यूजर इंटरफेस एवं जुड़ाव वाले संयोजी मानचित्र का विकास करना।

संचालित परियोजनाएं: 11 ( मध्यम अनुदान-03 एवं लघु अनुदान- 08)

वित्तीय वर्ष 2016-17
1 पार हिमालयी भाग में लद्दाख क्षेत्र में पर्यावरणीय परिवर्तन प्रभावों एवं पर्यावरणीय स्थितियों की निगरानी एवं अध्ययन
2 उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में कम लागत वाले भवनों के निर्माण हेतु बांस माइक्रोन फाइबरों से टिकाऊ बांस टुकड़ों एवं/पटलों का निर्माण
वित्तीय वर्ष 2017-18
3 वैकल्पिक आजीविका अवसरों के उत्पत्ति के साथ-साथ परंपरागत भवनों का संरक्षण एवं परंपरागत ज्ञान का प्रसार
4 भू-स्खलन पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने हेतु कम लागत युक्त तत् समय निगरानी वाले भूमि यंत्रों का विकास एवं रचना।
5 स्थानीय ज्ञान पद्धति हेतु बौद्धिक संपदा अधिकार की प्रासंगिकता के अनुरूप अरुणांचल प्रदेश के चयनित प्रमुख जनजातीय समाज के स्थानीय ज्ञान तंत्र का दस्तावेजीकरण
6 भारतीय हिमालयी क्षेत्र के हिमांचल प्रदेश एवं सिक्किम में स्थानीय उपलब्ध जैव संसाधनों से परिवर्तनकारी ग्रामीण तकनीकों के द्वारा सतत् आजीविका विकल्पकों का विकास
7 एक पाइलट प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखण्ड में पलायन प्रभावित गांवों में संस्कृति एवं पारिस्थितिकी का संरक्षण एवं सतत् पर्यटन का विकास
8 जम्मू एवं कश्मीर के हिमालयी क्षेत्र विभिन्न परम्परागत दुग्द्य आधारित किण्वित खाद्य पदार्थों के उत्पादन में लगी महिला की स्थानीय आजीविका हेतु तकनीकी हस्तक्षेप एवं उनका उपयोग
9 ग्रामीण उत्थानः प्रसंस्कृत चाय संयंत्र के अवशेष द्वारा जैव ईधन और जैविक उप-उत्पाद के उत्पादन हेतु टिकाऊ तकनीक का विकास करना।
10 पर्वतीय क्षेत्रों में वायरलैस नेटवर्क सेंसरों के उपयोग से पाईलपाईनों में जल क्षरण का क्लाउड-सहायक आॅकड़ा विश्लेषण आधारित तत् समय निगरानी और खोज
11 भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र हेतु दूरस्थ निगरानी एवं उन्नत कृषि पर नियंत्रण के लिए इंटरनेट आॅफ थिंग(कंप्यूटर युक्त स्वचालित उपकरणों) का उपयोग।

2020 तक मापकीय लक्ष्य

समस्त 12 भारतीय हिमालयी राज्यों में हिमालयी जल स्रोत्तों के जीर्णोधार हेतु राज्यवार कार्यक्रम।
भारतीय हिमालय क्षेत्र में चयनित 8 राज्यों में पर्वतीय जलस्रोत्तों की सूची विकसित करें।
स्थानीय स्तर पर जलागम योजना।
चयनित जलस्रोतों, झीलों, नदियों की जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक एकता की निगरानी।
4 राज्यों में उच्च क्षेत्रों में मौसम और उच्च जलवायु आधारित घटनाओं का आॅकड़ा संग्रहण।
जल प्रेरित आपदाओं की पूर्व सूचना और निगरानी तथा प्रारूपीकरण।
जल संसाधन प्रबंधन हेतु क्षमता विकास एवं प्रशिक्षण।



संपूर्ण निगरानी सूचक

चयनित गतिविधियों में नए आंकड़ों की संख्या, उदाहरणार्थ, परम्परागत धरोहरों व ईको-पर्यटन, परम्परागत हिमालयी ढांचों/भवनों व होमस्टे, अर्थात हस्तांतरण योग्य ग्रामीण तकनीकें, जैव संसाधनों की सतत् खेती आदि।
क्षेत्र केंद्रित अच्छे प्रयास/प्रदर्शन प्रारूप/हस्तक्षेपों की संख्या , उदाहरणार्थ सतत् कृषि प्रारूप/तकनीकें, प्रसंस्करण तकनीकी प्रारूप, सामुदायिक सहभागिता एवं स्वामित्व प्रारूप आदि।
दक्षता विकास कार्यक्रमों का व्यौरा, लाभार्थी उद्यमी, दस्तकारों व लाभार्थियों की संपूर्ण संख्या रूपया प्रति व्यक्ति आय संवर्धन के साथ।
ग्रामीण/सतत् उद्यमियों हेतु तकनीकी हस्तांतरण नियमावली आदि
प्रयोगात्मक एव प्रोत्साहित तथा स्थापित होम-स्टे मांडलों की संख्या
नई पैकेज तरीके/विकसित गुणवत्ता सुधार प्रक्रियाएं, बाजार पहुंच आदि के साथ कार्यक्षेत्र में क्षमता संवर्धन आंकलन हेतु विकसित एवं प्रमाणित संवेदक
दक्षता विकास कार्यक्रमों का व्यौरा, लाभार्थियों की संख्या, प्रकाशन एवं ज्ञान उत्पादन संख्या ।
प्रदेय

जारूकता विकास हेतु 2 शोध इकाईयों की स्थापना हुई।
कम लागत वाले सुदृढ़ भवनों की 5 प्रारूप इकाईयों की स्थापना की गई।
हिमालय में कम लागत वाले 1 भू-स्खलन पूर्व चेतावनी तंत्र का विकास किया गया।
एक तकनीकी सवर्द्धन केंद्र (टीआईसी) केंद्र की स्थापना।
10 प्रदर्शन/क्षेत्रीय प्रारूपों की स्थापना
रिसाव व क्षति के रखरखाव हेतु निवारक उपाय करते हुए 1 वेब आधारित तंत्र की स्थापना।
लगभग 100 क्षमता संवर्धन कार्यक्रमों का आयोजन किया जा चुका है।
उपलब्धियां आज तक ...

   
   
   
   
   
   
   
   
   
   



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पिछला नवीनीकरण: २५-०७-२०१८