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राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (एन.एम.एच.एस)

क्रियांन्वयन- पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार
नोडल एवं सेवा केन्द्र- गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान

वृहद विषयगत क्षेत्र २: आजीविका विकल्प एवं रोजगार

भारतीय हिमालयी परिदृश्य प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से धनी माना जाता है। जल, जमीन और जंगल के साथ-साथ 6.1 करोड़ लोगों इस क्षेत्र में निवास करते हैं। ये प्राकृतिक संसाधन अपनी आबादी के लिए आजीविका का प्रत्यक्ष और परोक्ष स्रोत हैं। दुर्भाग्यवश, वर्तमान में भूगर्भीय कारणों से यह क्षेत्र अत्यधिक कमजोर हो गया है। जनसंख्या का बढ़ता दबाव, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन , उपेक्षा, जलवायु प्रेरित कई उच्च / असामान्य घटनाओं और उनकी तीव्र भिन्नताओं इसके प्रमाण है। इसके साथ ही बुनियादी ढांचे और संचार नेटवर्क, सड़क निर्माण, खनन और जल विद्युत परियोजनाओं जैसी कई अन्य विकास गतिविधियां अक्सर स्थानीय पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र को विध्वंसक करती हैं। जिसने परिदृश्य में समृद्धि और प्रगति के लिए विविध विषयों को खड़ा किया है। जिस कारण केवल वैकल्पिक आजीविका विकल्प और रोजगार उत्पादन चुनने की आवश्यकता है। उपर्युक्त संदर्भ में प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को कम करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन वैकल्पिक प्राविधान कर रहा है। जिसमें वैकल्पिक आजीविका और आय सृजन, पर्यावरण अनुकूलित आर्थिक गतिविधियों का प्रसार, प्रकृति आधारित पर्यटन जिसमें इको टूरिज्म, स्वदेशी ज्ञान का दस्तावेजीकरण एवं नवीन तकनीकी विकास आदि सम्मिलित है। इस दिशा में, निम्नलिखित 29 परियोजनाएं राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत चल रही हैं । जिसका उद्देश्य किसी भी रूप में पर्वतीय लोगों की आय संवर्धन और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को संबोधित करना है।


IHR States Covered- 09 (J&K, UK, HP, AP, Sikkim, West Bengal, Manipur, Tripura and Meghalaya)

प्रमुख उद्देश्य

समुदाय में लचीलापन लाकर समुदाय एवं स्थानीय शासन की अनुकूलन क्षमता में विकास करना।
ग्रामीण तकनीकों को प्रोत्साहन अर्थात बाढ़ा कृषि तकनीक, मधुमक्खी पालन, आदि करना।
विभिन्न पारंपरिक ज्ञान की खोज एवं आयवर्धक विधियों एवं तरीकों को बढ़ावा करना।
मूल्यवर्धन और उद्यमिता विकास के द्वारा पर्वतीय समुदायों के लिए वैकल्पिक पूरक आजीविका विकल्पों को पैदा करना।
स्थानीय समुदायों, विशेषतः महिलाओं और कमजोर वर्ग का सशक्तिकरण करना।
परंपरागत एवं विकसित तकनीकों के प्रभावी प्रसार हेतु युवाओं सहित स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण देना।
संस्थागत नेटवर्किंग तंत्र की स्थापना।
सतत् पर्यटन सहित पारिस्थितिक पर्यटन करना।
विभिन्न हितधारकों के लिए प्रदर्शन केंद्र एवं प्रशिक्षण करना।
पर्यावरण अनुकूल पारंपरिक ग्रामीण प्रौद्योगिकी का दस्तावेजीकरण करना।
स्थानीय समाज की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार करना।

संचालित परियोजनाएं- २९ (वृहद अनुदान-०१, मध्यम अनुदान-१५ एवं लघु अनुदान-१३)

वित्तीय वर्ष २०१५-१६
1 वन्य उत्पादों पर शोध एवं परिवर्तन कर उनका मूल्य संवर्धन कर हिमालयी समुदाय की आजीविका बढ़ाना।
2 मध्य हिमालय में एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के द्वारा आजीविका सुधार की सतत् धारणा का विकास।
वित्तीय वर्ष २०१६-१७
3 अनिश्चित्ता के निपटान हेतु भारतीय हिमालयी क्षेत्र में परिवर्तनीय पर्यावरण हेतु समुदाय आधारित लचीले पारिस्थितिकीय तंत्र की स्थापना।
4 उत्तर पश्चिम हिमालयी हिमांचल के पर्वतीय समुदायों हेतु पर्यावरण परिवर्तन रोधी एवं जैवविविधता संरक्षण हेतु वैकल्पिक आजीविकास अवसरों वाली अभिनव तकनीकों का विकास।
5 हिमालयन उपक्षेत्र के शिमला एवं चंबा में पर्यटकीय हस्तक्षेप से पर्यावरणीय परिवर्तन की निगरानी एवं मूल्यांकन
6 स्थानीय पारिस्थिति का संरक्षण, रामबांस रोपण द्वारा बंजर भूमि प्रबंधन एवं गांवों में आजीविका गतिविधियों के आधार हेतु संसाधनों उपलब्ध करना।
7 कश्मीर घाटी में निर्धन ग्रामीणों के बीच स्थानीय तापमान के अनुरूप कट पुष्प बल्ब उत्पादन कर आजीविका सुधार एवं सशक्तिकरण।
वित्तीय वर्ष 2017-18
8  नगरीय -ग्रामीण पारिस्थितिकी को न्यूनतम क्षति पहुंचाकर संसाधन क्षमता का अधिकतम उपयोग हेतु हस्तक्षेप योग्य रणनीतियों बनाकर भारतीय हिमालयी लोगों की आजीविका अवसरों में सरलता एवं गुणवत्ता वृद्धि।
9  पर्वतीय उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के पारिस्थितिक तंत्र में युवाओं और महिलाओं के बीच सतत् पर्यटन अवसरों को विकसित कर उनकी आय वृद्धि एवं आजीविका विकल्प देना।
10  पश्चिमी रामगंगा नदी के उत्पत्ति स्थल दुधातोली क्षेत्र की महिलाओं पर केंद्रित काम द्वारा कुमाऊॅ और गढ़वाल के सीमांत पर्वतीय किसानों के लिए प्राकृतिक संसाधन आधारित आजीविका और रोजगार विकल्पों का विकास।
11 उत्तराखण्ड के गढ़वाल व कुमाऊॅ क्षेत्रों में तापीय बागवानी फसलों में अभिनव कार्य कर आजीविका विकास।
12 हिमांचल प्रदेश में कृषक महिलाओं में खाद्य सुरक्षा, आजीविका एवं उद्यमिता हेतु कार्यकारी खाद्य शोध एवं विकास केंद्र की स्थापना एवं विकसित तकनीकों का प्रसार।
13 ग्रामीण त्रिपुरा में आजीविका सुधार हेतु महिलाओं के लिए अनुकूल आजीविका उद्यम का कृषि आधारित पर्यावरण अनुकूल विकास एवं उत्थान।
14 पूर्वी हिमालय में कार्बन पृथक्करण और आजीविका सुधार पर विशेष ध्यान देने के साथ सतत् परम्परागत प्रबंधन कार्यों का आंकलन एवं दस्तावेजीकरण तथा सत्यापन।
15 भारतीय उत्तर-पूर्वी कच्छ भूमि मछुवारों की आर्यवर्धन, रोजगार सृजन एवं अच्छी आजीविका हेतु पर्यावरण अनुकूलित संलग्न/घेरा कृषि तकनीक को कृषि बढ़ाना।
16 जम्मू एवं कश्मीर के राजौरी जिले में वैज्ञानिक पद्धति से मधुमक्खी पालन कर जनजातीय लोगों में उद्यमिता विकास।
17 कंचनजंघा क्षेत्र में आजीविका एवं प्राकृतिक संरक्षण से जोड़ते हुए समुदाय आधारित सतत् पर्यटन को प्रोत्साहन।
18 उत्तर पश्चिम हिमालय में केसर की मूल्य श्रंखला बनाकर युवाओं एवं महिलाओं को सशक्त कर जैविक हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।
19 उत्तराखण्ड एवं हिमांचल प्रदेश में वन आधारित गाॅवों में सामुदायिक चारा बैंकों की स्थापना।
20 हिमालय के लिए चुनौती बने चीड़ पत्तियों का जैव-रूपांतरण कर अगली पीढ़ी के लिए जैव ईधन बनाना।
21 पर्यावरण और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए युवाओं एवं महिलाओं को सतत् आजीविका विकल्पों को सुनिश्चित करने के लिए टिहरी बाॅध परिधि क्षेत्र में पर्यटन का प्रचार।
22 पूर्वी हिमालय, अरुणांचल प्रदेश में संरक्षित क्षेत्रों में एवं वहां के स्थानीय लोगों लिए एक संभावित आजीविका विकल्प के रूप में वन्य जीवन एवं प्रकृति आधारित पर्यटन की तलाश। जैव विविधता संरक्षण हेतु एक सतत् दृष्टिकोंण।
23 हिमालयी मधुमक्खी पर्यवेक्षण एवं संग्रहालयः दार्जिलिंग के वन आच्छादित गाॅवों के सतत् विकास दिशा हेतु दस्तावेजीकरण, निगरानी एवं शोध।
24 लद्दाख के ठण्ड शुष्क इलाकों में आजीविकास सुधार हेतु गुणवत्तापूर्ण कंद के माध्यम से केसर उत्पाद ।
25 कश्मीर घाटी में सेब उत्पादन पर पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभावों, अनुकूलित किस्मों की छटनी।
26 उत्तर पश्चिमी हिमालय में ग्रामीण आजीविका और निर्णय समर्थन प्रणाली हेतु गैर काष्ठ जैव संसाधनों की उपलब्धता, उपयोग और डिजिटल दस्तावेज।
27 तकनीकी हस्तक्षेप कर पर्वतीय महिला कृषकों के पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति सुधार हेतु रणनीतियां।
28 लघु जल विद्युत परियोजना के जलक्षेत्रों के परितः समुदाय आधारित वन प्रबंधन एवं ईकोटूरिज्म के द्वारा जैव विविधता का संरक्षण एवं आजीविका विकास।
29 अरूणंाचल प्रदेश के मंेगियो क्षेत्र में बड़ी इलायची और अन्य बहुस्तरीय अभिनव खेती एवं इसके सत्त ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव।
2020 तक मापकीय लक्ष्य-

चयनित भारतीय हिमालयी राज्यों में पर्यावरण-पूर्वावस्था प्रारूपों का प्रदर्शन
अच्छी आजीविका एवं ग्रामीण रोजगार हेतु सफल कृषि विकल्पों व तकनीकों को अपनाना।
आय उत्पादन हेतु यथोचित तकनीकों का विकास।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र के चयनित क्षेत्रों में नए इको-टूरिज्म अवसरों को पैदा करना।
सभी क्षेत्रों के लिए संसाधनों की स्थिति, उपलब्धता और उपयोग पद्धति पर आॅकड़ों का डिजिटाईजेशन।
नीतिगत सुझाव एवं प्रभाव प्रकाशन- संक्षिप्त नीति, शोधपत्र, बुलेटिन, रिपोर्ट आदि।
क्षमता विकास (प्रत्येक भारतीय हिमालयी राज्य में एक कुल 12 प्रशिक्षण )


संपूर्ण निगरानी सूचक

क्षेत्र विशेष-आधारित सर्वोत्तम कार्य/प्रदर्शन प्रारूपों की संख्या का आवधिक प्रस्तुतिकरण।
नवीन प्रदर्शन तकनीकों, नए विकसित लघु उद्यमों एवं दक्षता विकास प्रशिक्षणों की संख्या ।
लाभान्वित हितधारकों की संख्या (युवा, महिला की संख्या एवं कुल लाभार्थी ) अद्यतन आय (रुपया/व्यक्ति)
क्षमता विकास कार्यक्रमोंएवं लाभान्वित हितधारकों की संख्या
विकसित ज्ञान उत्पादों नीति पत्रों व अन्य प्रकाशनों की संख्या ।
प्रदेय

न्यूनतम 10 प्रदर्शन प्रारूपों का विकास।
परीक्षण प्रौद्यिगिकी के उपयोग हेतु प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए 15 उच्च स्तरीय प्रारूपों की स्थापना।
जीआईए आधारित एसडीएम को शुरू कर निर्णय समर्थन प्रणाली का विकास।
60 समुदाय आधारित गाॅव विकास योजना का विकास।
15 प्रशिक्षण नियमावली एवं क्षेत्र आधारित नियमावलियों का विकास।
100 प्रशिक्षण/कार्यशालओं का आयोजन
ज्ञान उत्पादों का विकास- शोध पत्र-45, पुस्तक अध्याय-20, मोनोग्राम-10, कार्ययोजनाऐं-5, रिपोर्ट एवं प्रचार सामग्री-30 आदि।
3 हजार से अधिक हितधारकों का क्षमता विकास।
उपलब्धियां आज तक ...

वन्य बेरी एवं अखरोट के निपटान, पैदावार एवं खरीद के लिए मानकीय परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) पर एक नई पद्धति का विकास।
बेकार भूमि पुनर्वास प्रारूप-1, 2.5 हेक्टेअर भूमि में बागवानी और बहुद्देशीय प्रजातियों का पौधरोपण।
116 से अधिक परिवारों ने जैव ब्रिकेटिंग प्रौद्योगिकी माॅडल को अपनाकर 50 हजार रूपया वार्षिक से अधिक आय अर्जित की।
मानक परिचान प्रक्रिया पर एक प्रशिक्षण मैनुअल का प्रकाशन।
9 ग्रामीण तकनीकी प्रारूप को अपनाकर 183 परिवार लाभान्वित।
14 कार्यशाला/प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन। (164 लोग लाभान्वित)
उत्तराखण्ड के तीन जिलों में 16 वन्य उत्पादों का चिन्हीकरण।
ज्ञान उत्पादों का विकास- 4 शोध पत्र, 2 रिपोर्ट/प्रचार सामग्री आदि।



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पिछला नवीनीकरण: २५-०७-२०१८